गुरु नानक जयंती पर विशेष: भारत की दिव्य विभूति थे महान संत गुरु नानक देव जी
गुरुनानक देव ने संसार के दुखों को घृणा, झूठ और छल – कपट से परे होकर देखा। इसलिए वे इस धरती पर मानवता के नवीनीकरण के लिए निकल पड़े। वे सच्चाई की मशाल लिए, अलौकिक स्नेह , मानवता की शांति और प्रसन्नता के लिए चल पड़े।
By Navodit Saktawat
Edited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Mon, 07 Nov 2022 03:06:44 PM (IST)
Updated Date: Mon, 07 Nov 2022 03:06:44 PM (IST)
मृत्युंजय दीक्षित
महान सिख संत व गुरु नानक देव जी का जन्म 1469 ई में रावी नदी के किनारे स्थित रायभुए की तलवंडी में हुआ था जो ननकाना साहिब के नाम से जाना जाता है और भारत विभाजन में पाकिस्तान के भाग में चला गया। इनके पिता मेहता कालू गांव के पटवारी थे और माता का नाम तृप्ता देवी था। इनकी एक बहन भी थी जिनका नाम नानकी था। बचपन से ही नानक में प्रखर बुद्धि के लक्षण और सासांरिक चीजों के प्रति उदासीनता दिखाई देती थी। पढ़ाई- लिखाई में इनका मन कभी नहीं लगा। सात वर्ष की आयु में गांव के स्कूल में जब अध्यापक पंडित गोपालदास ने पाठ का आरंभ अक्षरमाला से किया लेकिन अध्यापक उस समय दंग रह गये जब नानक ने हर एक अक्षर का अर्थ लिख दिया। गुरु नानक के द्वारा दिया गया यह पहला दैविक संदेश था।
कुछ समय बाद बालक नानक ने विद्यालय जाना ही छोड़ दिया। अध्यापक स्वयं उनको घर छोड़ने आये। बालक नानक के साथ कई चमत्कारिक घटनाएं घटित होने लगीं जिससे गांव के लोग इन्हें दिव्य शक्ति मानने लगे। बचपन से ही इनके प्रति श्रद्धा रखने वाले लोगों में इनकी बहन नानकी गांव के शासक प्रमुख थे। कहा जाता है कि गुरुनानक का विवाह 14 से 18 वर्ष के बीच गुरूदासपुर जिले के बटाला के निवासी भाईमुला की पुत्री सुलक्खनी के साथ हुआ। उनकी पत्नी ने दो पुत्रों को जन्म दिय। लेकिन गुरु पारिवारिक मामलों में पड़ने वाले व्यक्ति नहीं थे। उनके पिता को भी जल्द ही समझ में आ गया कि विवाह के बाद भी गुरु अपने आध्यात्मिक लक्ष्य से पथभ्रष्ट नहीं हुए थे। वे शीघ्र ही अपने परिवार का भार अपने श्वसुर पर छोड़कर अपने चार शिष्यों मरदाना,लहना, नाला और रामदास को लेकर यात्रा के लिए निकल पड़े़।
गुरुनानक देव ने संसार के दुखों को घृणा, झूठ और छल – कपट से परे होकर देखा। इसलिए वे इस धरती पर मानवता के नवीनीकरण के लिए निकल पड़े। वे सच्चाई की मशाल लिए, अलौकिक स्नेह , मानवता की शांति और प्रसन्नता के लिए चल पड़े। वे उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम चारों तरफ गये और हिंदू ,मुसलमान, बौद्धों, जैनियों, सूफियों, योगियों और सिद्धों कें विभिन्न केद्रों का भ्रमण किया। उन्होंने अपने मुसलमान सहयोगी मरदाना जो कि एक भाट था के साथ पैदल यात्रा की। उनकी यात्राओं को पंजाबी में उदासियां कहा जाता है। इन यात्राओं मे आठ वर्ष बिताने के बाद घर वापस लौटे।
गुरुनानक एक प्रकार से सर्वेश्वर वादी थे। रूढ़ियों और कुप्रथा के तीखे व प्रबल विरोधी थे। उनके दर्शन में वैराग्य के साथ साथ साथ तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक स्थितियों पर भी विचार दिए गए हैं है। संत साहित्य में नानक ने नारी को उच्च स्थान दिया है। इनके उपदेश का सार यही होता था कि ईश्वर एक है। हिंदू, मुसलमान दोनों पर ही इनके उपदेशों का प्रभाव पड़ता था। कुछ लोगों ने ईर्ष्या वश उनकी शिकायत तत्कालीन शासक इब्राहीम लोदी से कर दी जिसके कारण कई दिनों तक कैद में भी रहे। कुछ समय बाद जब पानीपत की लड़ाई में इब्राहीम लोदी बाबर के साथ लड़ाई में पराजित हुआ तब कहीं जाकर गुरुनानक कैद से मुक्त हो पाये। जीवन के अंतिम दिनों में गुरु नानक देव की ख्याति बढ़ती चली गयी तथा विचारों में भी परिवर्तन हुआ। उन्होनें करतारपुर नामक एक नगर भी बसाया था।
अपने दैवीय वचनों से उन्होंने उपदेश दिया कि केवल अद्वितीय परमात्मा की ही पूजा होनी चाहिये। कोई भी धर्म जो अपने मूल्यों की रक्षा नहीं करता वह अपने निम्न स्तर के विकास को दर्शाता है और आने वाले समय में अपना अस्तित्व खो देता है । उनके संदेश का मुख्य तत्व इस प्रकार था – ईश्वर एक है, ईश्वर ही प्रेम है, ईश्वर की दृष्टि में सारे मनुष्य समान हैं । वे सब एक ही प्रकार जन्म लेते हैं और एक ही प्रकार अंतकाल को भी प्राप्त होते हैं। ईष्वर भक्ति प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। उसमें जाति- पंथ ,रंगभेद की कोई भावना नहीं है। 40वें वर्ष में ही उन्हें सतगुरु के रूप में मान्यता मिल गयी। उनके अनुयायी सिख कहलाये। उनके उपदेशों के संकलन को जपजी साहब कहा जाता है। प्रसिद्ध गुरू ग्रंथसाहिब में भी उनके उपदेश और संदेश हैं। सभी भारतीय उन्हें पूज्य मानते हैं और भक्तिभाव से इनकी पूजा करते हैं।
कवि ननिहाल सिंह ने लिखा है कि, “वे (गुरु नानक देव जी ) पवित्रता की मूर्ति थे उन्होंने पवित्रता की शिक्षा दी। वे प्रेम की मूर्ति थे उन्होंने प्रेम की शिक्षा दी। वे नम्रता की मूर्ति थे, नम्रता की शिक्षा दी। वे शांति और न्याय के दूत थे । समानता और शुद्धता के अवतार थे। गुरूनानक जी ने संदेश दिया कि वही सर्वश्रेष्ठ ईश्वर सब का परमेश्वर है।”
गुरुनानक जी के दर्शन, उनकी शिक्षाओं और गहरी अंतर्दृष्टि के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। संत गुरूनानक मानव रूप में एक ईश्वरीय आत्मा थे।
प्रेषक- मृत्युंजय दीक्षित
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