शिव क्यों कहलाए त्रिपुरारी और क्या है कार्तिक पूर्णिमा से संबंध

शिव क्यों कहलाए त्रिपुरारी और क्या है कार्तिक पूर्णिमा से संबंध


मानव सभ्यता ने अपनी शुरुआत से अब तक इतने आयाम छू लिए हैं। ऐसे में प्रकाश के कई कृत्रिम स्रोतों का आविष्कार हो जाने के बाद भी चंद्रमा…।

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Publish Date: Sun, 17 Nov 2013 10:10:32 AM (IST)

Updated Date: Sun, 17 Nov 2013 02:05:19 PM (IST)

शिव क्यों कहलाए त्रिपुरारी और क्या है कार्तिक पूर्णिमा से संबंध

मानव सभ्यता ने अपनी शुरुआत से अब तक इतने आयाम छू लिए हैं। ऐसे में प्रकाश के कई कृत्रिम स्रोतों का आविष्कार हो जाने के बाद भी चंद्रमा या कहें ‘मून लाइट’ जैसा आकर्षण अब तक किसी भी प्रकाश के स्त्रोत में नहीं ला पाए हैं। भारतीय संस्कृति में चंद्रमा को मन और भावनाओं का पूरक माना गया है। इस बात की पुष्टि मनोविज्ञान भी करता है कि चंद्रमा के बढ़ते और घटते आकार का मनुष्य ही नहीं, हर प्राणी के मन पर सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

…तो इसलिए कहलाए ‘त्रिपुरारी’

हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष 16 अमावस्या पड़ती हैं पर दिवाली के 15 दिन आने बाद आने वाली कार्तिक मास की पूर्णिमा पड़ती है जो अंधकार का नाश करती है। शास्त्रों में उल्लेख है कि इसी पूर्णिमा को भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नाम के असुर का वध किया था और वह त्रिपुरारी कहलाए।

शुभ संयोग

रविवार दिनांक17.11.2013 को रात्रिकालीन, सूर्य प्रधान प्रातः कालीन भरणी नक्षत्र है। सूर्य इस दिन वृश्चिक राशि में प्रवेश कर रहा है। जब कि चंद्र मेष राशि में है। इस दिन पद्मक व महाकार्तिकी योग भी है शास्त्रों में उल्लेख है कि इस दिन ग्रह-नक्षत्रों की दशा को लेकर बहुत सारे योगों का वर्णन है। इस दिन शुक्रप्रधान भरणी नक्षत्र में होने के कारण गंगा स्नान से सारे ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं, इसीलिए इस योग को ‘महाकार्तिकी’ भी कहा गया है। संयोग से इस दिन चंद्र और सूर्य की यही स्थिति है। माना जाता है कि इस अवस्था में गंगा स्नान करने से ‘पुष्कर’ से भी अधिक धर्म लाभ मिलता है।

हरि ने बचाई थी पृथ्वी

इसी दिन सृष्टि की रक्षा करने के लिए भगवान श्रीहरि ने जगत के प्रलय काल में मत्स्य अवतार धारण किया था। भगवान का संदेश है कि ‘तरलता और लचीलेपन से प्रलय जैसी अवस्था में भी स्वयं की और पूरी सृष्टि की रक्षा की जा सकती है।’

गंगा स्नान का महत्व

महाभारत के 18 दिन लंबे युद्ध में मारे गए सम्बंधियों और योद्धाओं की आत्मा की शांति के लिए भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से युधिष्ठिर ने कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से चतुर्दशी तक यज्ञ किया और पूर्णिमा को ही गंगा स्नान कर पूर्णाहुति दी। कहते हैं कि इस दिन गंगा स्नान करने से पितृ दोषों से मुक्ति मिलती है।



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