Guru Purnima : पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह हैं गुरु गुरु पूर्णिमा
अर्थात गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही शंकर है व गुरु ही साक्षात परब्रह्म है और उन्हीं सद्गुरु को हम प्रणाम करते हैं। गुरु को भगवान इसलिए माना जाता है क्योंकि गुरु ही हमें संसार रूपी भव सागर को पार करने में हमारी मदद करते हैं।
गुरु से हमें ज्ञान प्राप्त होता है और उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। शास्त्रों मे ऐसा कहा गया है कि अगर आपको ईश्वर श्राप दे देते हैं तो आपके गुरु ही आपकी रक्षा कर सकते हैं, लेकिन अगर आपको आपके गुरु ने श्राप दे दिया तो भगवान भी आपकी रक्षा नही कर सकते हैं और न उस पाप से आपको बचा सकते हैं।
गुरु की महिमा सिर्फ पौराणिक काल में ही नहीं थी, कबीर ने भी गुरु की महिमा का गान किया है। कबीर कहते हैं –
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय
गुरु पूर्णिमा का महत्व
पौराणिक मान्यता के अनुसार महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्म इसी दिन हुआ था। पुराणों की कुल संख्या 18 है और उन सभी 18 पुराणों के रचयिता महर्षि वेदव्यास को माना जाता है। इन्होंने वेदों को विभाजित किया है, जिसके कारण इनका नाम वेदव्यास पड़ा था। वेदव्यास जी को आदिगुरु भी कहा जाता है इसलिए गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।
गुरु से तात्पर्य
शास्त्रों में ‘गु” का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और ‘रु” का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु” कहा जाता है।
‘अज्ञान तिमिरांधश्च ज्ञानांजन शलाकया,चक्षुन्मीलितम तस्मै श्री गुरुवै नम: “
गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।
वर्षा में ही क्यों मनाते हैं गुरु पूर्णिमा?
अक्सर मन में सवाल उठता है कि गुरु पूर्णिमा वर्षाकाल में ही क्यों मनाई जाती है। आषाढ़ मास में आने वाली पूर्णिमा का तो पता भी नहीं चलता है। आकाश में बादल घिरे हो सकते हैं और बहुत संभव है कि चंद्रमा के दर्शन तक न हो पाएं।
तब बिना चंद्रमा के कैसी पूर्णिमा! अगर किसी पूर्णिमा का जिक्र होता है तो वह शरद पूर्णिमा का हो सकता है तो फिर शरद की पूर्णिमा को क्यों न श्रेष्ठ माना जाए क्योंकि उस दिन चंद्रमा की पूर्णता मन मोह लेती है। मगर महत्व तो आषाढ़ पूर्णिमा का ही अधिक है। आषाढ़ की पूर्णिमा को चुनने के पीछे गहरा अर्थ है।
अर्थ है कि गुरु तो पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह हैं जो पूर्ण प्रकाशमान हैं और शिष्य आषाढ़ के बादलों की तरह है। आषाढ़ में चंद्रमा बादलों से घिरा रहता है जैसे बादल रूपी शिष्यों से गुरु घिरे हों।
शिष्य सब तरह के हो सकते हैं, वे अंधेरे बादल की तरह भी हो सकते हैं, उसमें भी गुरु चांद की तरह चमक सके, उस अंधेरे से घिरे वातावरण में भी प्रकाश जगा सके, तो ही गुरु पद की श्रेष्ठता है। इसलिए आषाढ़ की पूर्णिमा का महत्व है! इसमें गुरु की तरफ भी इशारा है और शिष्य की तरफ भी। यह इशारा तो है ही कि दोनों का मिलन जहां हो, वहीं कोई सार्थकता है।
ज्ञान का मार्ग है गुरु पूर्णिमा
शास्त्रों में गुरु अज्ञान के अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश देने वाला कहा गया है। गुरु हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले होते हैं। गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार संभव हो पाता है और गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं हो पाता।
पारलौकिकता
गुरु आत्मा-परमात्मा के मध्य का संबंध होता है। यहां गुरु की भूमिका सिर्फ शिक्षा तक ही सीमित नहीं है। परमात्मा से भी गुरु के माध्यम से संबंध जुड़ता है। गुरु से जुड़कर ही जीव अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने में सक्षम होता है तथा उसका साक्षात्कार प्रभु से होता है।
हम तो साध्य हैं किंतु गुरु वह शक्ति है जो हमारे भीतर भक्ति के भाव को आलौकिक करके उसमे शक्ति के संचार का अनुभव कराती है और ईश्वर से हमारा मिलन संभव हो पाता है। विद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों द्वारा आज भी इस दिन गुरु को सम्मानित किया जाता है. मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं।