MP में पहली बार देपालपुर के किसान ने बोया काला गेहूं, कई बीमारियों में है उपयोगी
इस गेहूं में रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होने के साथ ही यह मोटापा, कैंसर, डायबिटीज, तनाब और दिल की बीमारियों से लड़ने में कारगर है।
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Publish Date: Sat, 17 Nov 2018 10:42:06 PM (IST)
Updated Date: Sun, 18 Nov 2018 07:33:35 AM (IST)
इंदौर (विपिन अवस्थी)। प्रदेश में पहली बार देपालपुर के गांव शाहपुरा के किसान सीताराम गहलोत काले गेहूं की खेती कर रहे हैं। इसे वे पंजाब के नेशनल एग्री फूड बायोटेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट (एनएबीआई) मोहाली से खुद लेकर आए हैं और अपने खेत में श्री विधि से काले गेहूं (ब्लैक व्हीट ) की बोवनी कर रहे हैं। इस गेहूं में सामान्य गेहूं की अपेक्षा रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होने के साथ ही यह मोटापा, कैंसर, डायबिटीज, तनाब और दिल की बीमारियों से लड़ने में कारगर है।
गहलोत ने बताया कि वे इस गेहूं के लिए पिछले दो साल से एनएबीआई के चक्कर काट रहे हैं। अभी भी केन्द्र में इस गेहूं को लेकर प्रयोग लगातार किए जा रहे हैं। इसलिए इसका मिलना मुश्किल था। इस बार गेहूं उपलब्ध कराया है, लेकिन उसकी मात्रा महज 5 किलो है। इसे खेत में श्री विधि से बोया है, जिससे इसका उत्पादन बढ़ाया जा सके। शनिवार को इसकी पहली बार बोवनी की है। अब उत्पादन का इंतजार है।
श्री विधि से होगा अधिक उत्पादन
एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट एजेंसी (आत्मा) के उप संचालक शर्लिन थॉमस के अनुसार किसी भी सामान्य गेहूं की श्री विधि से खेती करने पर उसकी उत्पादन क्षमता बढ़ जाती है। ब्लैक व्हीट किसान को कम मात्रा में मिला है और इसकी उत्पादन क्षमता अधिक बढ़ाने के लिए श्री विधि से खेती करना जरूरी है। श्री विधि से खेती करने पर दूसरा फायदा यह होता है कि तेज हवा और तेज पानी के कारण फसल का नुकसान नहीं होता। इसमें बालियां अधिक होती हैं, जिससे पैदावार बढ़ती है।
नौ साल से चल रही रिसर्च
इस गेहूं की रिसर्च मोहाली के नाबी केन्द्र में 2010 से चल रही है। इसे लेकर सरकार ने भी प्रयास शुरू कर दिए हैं। पंजाब में इसका समर्थन मूल्य 3250 रुपए घोषित कर दिया गया है। रिसर्च कर रहे वैज्ञानिक भी इसकी पैदावार को अधिक बढ़ाने के प्रयास में लगे हैं।
ऐसे होती है श्री विधि से खेती
यह पद्धति गेहूं की खेती करने का नया तरीका है, जिसमें धान की श्री विधि सिद्धांतों (धान बोने का तरीका) का पालन करके प्रति इकाई क्षेत्र में अधिक उपज प्राप्त की जाती है। इस पद्धति में बीज शोधन, बीज उपचार व बुआई के तरीके में परिवर्तन होता है। इस पद्धति से बुआई के समय खेत में अंकुरण के लिए पर्याप्त नमी होना चाहिए, क्योंकि पर्याप्त नमी नहीं होगी तो अंकुर सूख जाएंगे। बीजों को हाथ से बोया जाता है, पौधे से पौधे और कतार से कतार की दूरी 20 सेमी होनी चाहिए। इसके लिए पतले कुदाल से 2.5 से 3 सेमी गहरी नालियां बनाते हैं और उसमें बीज डालते हैं। इसके बाद मिट्टी से ढंक देते हैं। पौधे से पौधे में दूरी होने के कारण इनकी जड़ें अच्छे से फैलती हैं, इसमें बालियों की संख्या अधिक निकलती है। इसके साथ ही नुकसान की संभावना भी कम हो जाती है।
एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा अधिक
ब्लैक व्हीट (काला गेहूं) को गेहूं अनुसंधान केन्द्र में भी मंगवाया गया है। यहां भी इस बीज का प्रयोग किया है। कोई यूनिक बीज है, इसमें एंटी ऑक्सीडेंट की मात्रा अधिक है, जिससे बीपी, शुगर जैसे रोगों से लड़ने में कारगर साबित होगा। अभी इसकी पैदावार कम है। मोहाली का नाबी केन्द्र लगातार प्रयास में लगा हुआ है। जिस किसान ने इस खेती की यहां से शुरुआत की है, उसका कार्य सराहनीय है – एके सिंह, प्रधान वैज्ञानिक गेहूं अनुसंधान केन्द्र, इंदौर