MP Election 2023: बढ़ा मतों का ‘विश्वास’… अब ‘सियासत’ को निभानी होगी अपनी जिम्मेदारी

MP Election 2023: बढ़ा मतों का ‘विश्वास’… अब ‘सियासत’ को निभानी होगी अपनी जिम्मेदारी


MP Election 2023: जड़ता को दूर करने और लोगों का भरोसा जीतने के लिए एक दशक में विधायिका और कार्यपालिका दोनों ने मैदान में ताकत लगाई।

By Prashant Pandey

Edited By: Prashant Pandey

Publish Date: Mon, 20 Nov 2023 10:06:48 AM (IST)

Updated Date: Mon, 20 Nov 2023 10:16:09 AM (IST)

MP Election 2023: बढ़ा मतों का 'विश्वास’... अब 'सियासत' को निभानी होगी अपनी जिम्मेदारी
इंदौर में विधानसभा क्षेत्र क्रमांक दो स्थित सुगनीदेवी स्कूल में बने मतदान केंद्र पर लंबी कतार लगी थी।

HighLights

  1. जनता ने चुनावी प्रक्रिया पर और अधिक विश्वास जताते हुए 77 प्रतिशत से अधिक मतदान किया।
  2. घोषणाएं जब मैदान में आकार लेने लगीं तो अविश्वास की खाई भी धीरे-धीरे भरने लगी।
  3. महिलाओं के मत प्रतिशत में दो से पांच प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई।

MP Election 2023: डा. जितेंद्र व्यास। भारत यूं ही दुनिया का सबसे बड़ा और शक्तिशाली लोकतंत्र नहीं है। हम अपने लोकतंत्र को श्रेष्ठ बनाए रखने के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर विश्वास जताते हुए प्रदेश और देश के लिए प्रतिनिधि चुनते हैं और उनसे यह अपेक्षा रखते हैं कि वे जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरते हुए तंत्र में अपने चुनाव को सार्थक बनाए।

वर्ष 2023 का विधानसभा चुनाव भी इसी भाव को केंद्र में रखकर हुआ। लेकिन इस बार का चुनाव कई मायनों में खास है। बीते 66 सालों के मतदान का रिकार्ड इस बार टूटा। प्रदेश की जनता ने चुनावी प्रक्रिया पर और अधिक विश्वास जताते हुए 77 प्रतिशत से अधिक मतदान किया।

पहली बार वोट करने वाले युवाओं के साथ ही महिलाओं ने जिस तरह अपनी भागीदारी बढ़ाई उसने राजनीति को यह स्पष्ट संकेत भी दिया कि बमुश्किल जनता दोबारा उनके दावों और वादों पर एतबार करने लगी है।

इसे बनाए रखने के लिए राजनेताओं को अपनी जिम्मेदारी और गंभीरता से निभानी होगी। बीते एक दशक से मध्य प्रदेश में विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान यह बात सामने आती रही कि लोग मतदान करने में रुचि नहीं लेते इस वजह से हमारे यहां मत प्रतिशत कम रहता है।

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राजनीतिक दल अपने-अपने स्तर पर वोट प्रतिशत बढ़ाने का प्रयास करते भी हैं लेकिन उनकी मंशा लोकहित में कम और स्वहित में अधिक होने की वजह से जनता के बीच यह प्रयास उतना प्रभावी नहीं हो पा रहा था। मत प्रतिशत बढ़ाने के प्रयास को अमलीजामा पहनाने का कार्य चुनाव संचालन की जिम्मेदारी निभाने वाले तंत्र यानी निर्वाचन आयोग ने भी किया।

शहरी क्षेत्रों से लेकर छोटे-छोटे गांवों तक भी इस तंत्र ने पहुंचकर लोगों को जागरूक करने का कार्य किया कि लोकतंत्र में यदि वे अपने मताधिकार का ही प्रयोग नहीं करेंगे तो बेहतर जनप्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया को कहीं न कहीं बाधित ही करेंगे। उधर, अविश्वास के संकट से जूझते राजनेताओं-जनप्रतिनिधियों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती भी यही रही कि कैसे जनता उनकी बातों पर विश्वास करे।

दरअसल बीते दो-तीन दशकों में राजनीतिक दलों और राजनेताओं की चुनाव के पहले किए वादों को चुनाव के बाद याद तक नहीं करने की प्रवृत्ति से लोगों का विश्वास उठने लगा था। जन में आम धारणा यही बन रही थी कि राजनीति और राजनेता कोई बात कह रहे हैं या वादा कर रहे हैं तो उसके पूरा होने की उम्मीद मत कीजिए।

कथनी और करनी में अंतर से उपजे इसी अविश्वास ने पूरी चुनावी प्रक्रिया को अरुचिकर भी बनाया। चुने जाने से पहले तक जो नेता उनके आसपास होने का दावा करते थे वे जनप्रतिनिधि बनते ही जन की पहुंच से दूर हो जाते थे।

क्षेत्र के लोग अपनी छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर भी हफ्तों-महीनों तक परेशान होते रहते थे लेकिन राहत नहीं मिल पाती थी। इस जड़ता को दूर करने और लोगों का भरोसा जीतने के लिए बीते एक दशक में विधायिका और कार्यपालिका दोनों ने मैदान में ताकत लगाई।

प्रक्रिया को ज्यादा से ज्यादा पारदर्शी और आसान बनाने के साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाने लगा कि योजनाओं को अमलीजामा पहनाने से लेकर समाज के अंतिम व्यक्ति तक उनका लाभ पहुंचने तक की मानीटरिंग का तंत्र पुख्ता हो। यह तरीका कहीं न कहीं कारगर साबित भी हुआ।

घोषणाएं जब मैदान में आकार लेने लगीं तो अविश्वास की खाई भी धीरे-धीरे भरने लगी। बीते चार चुनाव से बढ़ रहा मतदान प्रतिशत इस बार इसी वजह से रिकार्ड कायम कर सका। विधानसभा चुनाव में महिला मतदाताओं की भागीदारी भी गौर करने लायक रही। इस चुनाव को यदि महिला योजनाओं पर केंद्रित चुनाव भी कहा जाए तो भी अतिश्योक्ति नहीं होगी।

भाजपा ने जहां लाड़ली बहना सहित कई योजनाएं शुरू कर उसका सीधा लाभ महिलाओं को पहुंचाना शुरू कर दिया तो कांग्रेस ने महिला प्रधान योजनाओं को अपने घोषणापत्र में शामिल करते हुए अपनी चुनावी सभाओं में उन पर जमकर चर्चा की।

महिलाओं के लिए शुरू की गई योजानओं का प्रभाव कहें या फिर जागरूकता का असर लेकिन इस बार प्रदेश की दर्जनों सीटों पर महिलाओं के मत प्रतिशत में दो से पांच प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई।

38 साल में मिली यह सफलता..लेकिन अभी सफर है बाकी विधानसभा चुनाव में रिकार्ड तोड़ मतदान के मायने राजनीतिक दल भले ही अपने-अपने पक्ष में बताएं लेकिन इतना तय है कि हमें 75 प्रतिशत से अधिक मतदान के लक्ष्य तक पहुंचने में 38 वर्ष से अधिक का समय लग गया।

1985 में 49.79 प्रतिशत मतदान चुनाव में हुआ था। इसके बाद 1990 में 54.21 प्रतिशत, 1993 में 60.17 प्रतिशत, 1998 में 60.21 प्रतिशत, 2003 में 67.25 प्रतिशत, 2008 में 69. 78 प्रतिशत, 2013 में 72.13 प्रतिशत 2018 में 75.63 प्रतिशत और इस बार 2023 में 77.15 प्रतिशत मतदान हुआ है।

शत-प्रतिशत के लक्ष्य तक पहुंचने में हमें अभी लंबा रास्ता तय करना है। इसके लिए आवश्यक है कि हमारे जनप्रतिनिधि और अधिक जवाबदेह हों और विश्वसनीय कार्यप्रणाली के साथ जन के बीच पहुंचे ताकि जनता का तंत्र के प्रति विश्वास गहरा हो।



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